धर्म तन्त्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे ।

धर्म तन्त्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे ।
जन मानस को आडम्बर से मत भटकाओ रे ॥ 1 ॥

इसी राजपथ पर अतीत ने वह वैभव पाया।
जिस वैभव से “जगतगुरु” यह भारत कहलाया॥
उस वैभव को स्वार्थ सिद्धि में नहीं गवाओ रे ।
धर्म तन्त्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे ॥ 2 ॥

स्वार्थ सिद्धि की पगडन्डी मत जोड़ो जनपथ से ।
मत बाँधो भ्रम के पत्थर जन मंगल के रथ से ॥
धर्म तन्त्र की गति के पहिये मत अटकाओ रे ॥
जन मानस को आडम्बर में मत भटकाओ रे॥ 3 ॥

मुक्ति मिली है जन मानस को धर्म तन्त्र से ही ।
मानवता उबरी संकट से इसी मन्त्र से ही॥
धर्म धार कर सदाचार का पाठ पढ़ाओ रे॥
धर्म तन्त्र के स्वस्थ-रूप को सबल बनाओ रे॥ 4 ॥

विकृतियों से, दुष्कृतियों से सबको मुक्ति मिले ।
जन मानस का तम हरने हो ज्ञान-प्रदीप जले॥
धर्म तन्त्र की गरिमा जग को फिर समझाओ रे।
जन मानस को आडम्बर से मत भटकाओ रे ॥ 5 ॥

वसुधा है कुटुम्ब, मानव सब भाई-भाई हैं।
इसके सुख-दुःख के समान सब उत्तरदायी हैं॥
मानव की वसुधा पर सब मिल स्वर्ग बसाओ रे ।
धर्म तन्त्र के स्वस्थ-रूप को सम्बल बनाओ रे ॥ 6 ॥

शील, सत्य, सौजन्य, स्नेह का सब ही पाठ पढ़ें।
समता, प्रगति, समृद्धि, शाँति के पथ पर सभी बढ़े॥
धर्म-ध्वजा को जीवन में, जग में, फहराओ रे ।
जन मानस को आडम्बर में मत भटकाओ रे ॥ 7 ॥

..............................अखण्ड ज्योति Jan1971

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