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महाकवि माघ को अपने पाँडित्य का बड़ा अभिमान था। कभी-कभी उनके आचरण से उसकी झलक भी मिलती रहती थी, पर उनको छोड़ने का किसी को साहस न होता।

एक बार माघ राजा भोज के साथ वन विहार से लौट रहे थे। मार्ग में एक झोपड़ी पड़ती थी। एक वृद्धा उसके पास बैठी चरखा कात रही थी। माघ ने वही अभिमान प्रदर्शित करते हुए पूछा, ‘यह रास्ता कहाँ जाता है?’...

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