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बेल बजी तो द्वार खोला। द्वार पर शिवराम खड़ा था। शिवराम हमारी सोसायटी के लोगों की गाड़ियाँ, बाइक्स वगैरह धोने का काम करता था।

"साहब, जरा काम था।"

"तुम्हारी पगार बाकी है क्या, मेरी तरफ ? "

"नहीं साहब, वो तो कब की मिल गई। पेड़े देने आया था, बेटा दसवीं पास हो गया।"

"अरे वाह ! आओ अंदर आओ।"

मैंने उसे बैठने को कहा।...

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